छठ पूजा, जो मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, चार दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत पवित्र और कठोर लोक पर्व है। यह पर्व अनुशासन, आत्म-संयम और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस महापर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से होती है और हर दिन का अपना एक अलग धार्मिक महत्व और पूजा विधि होती है। इस दौरान व्रती अपनी आस्था को प्रकट करते हुए विशेष विधियों का पालन करते हैं। वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स के अनुसार, छठ पूजा के चार दिनों की संपूर्ण विधि को समझना जरूरी है।
छठ पूजा विधि 2025 (Chhath Puja Vidhi 2025)
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ पर्व का आरंभ ‘नहाय-खाय’ से होता है, जिसका अर्थ है ‘स्नान करके खाना’। इस दिन व्रती अपने आप को शुद्ध करने के लिए नदी, तालाब या घर पर गंगाजल मिले पानी से स्नान करते हैं। इसके बाद पूरे घर की साफ-सफाई की जाती है और व्रत के लिए शुद्ध सात्विक भोजन तैयार किया जाता है।
- भोजन में मुख्य रूप से कद्दू की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल (बिना उबला चावल) का प्रयोग किया जाता है।
- इस दिन लहसुन और प्याज का उपयोग नहीं किया जाता है।
- व्रती सबसे पहले इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं, जिसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं।
- इसी दिन से व्रत के कठोर नियम और शुद्धता का पालन शुरू हो जाता है।
दूसरा दिन: खरना
छठ का दूसरा दिन ‘खरना’ कहलाता है, जो शुद्धि और 36 घंटे के निर्जला व्रत की तैयारी का दिन होता है। इस दिन व्रती पूरे दिन लगभग 12-14 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। शाम के समय, मिट्टी के चूल्हे पर शुद्धता से गुड़ की खीर और रोटी बनाई जाती है।
- सूर्य देव और छठी मैया को इस प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
- व्रती इसी प्रसाद को ग्रहण करके अपना दिनभर का उपवास तोड़ते हैं।
- खरना का प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही व्रती का 36 घंटे का लंबा निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
यह छठ पूजा का मुख्य दिन होता है जब व्रती डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दिन व्रत के प्रसाद जैसे ठेकुआ, चावल के लड्डू, फल और अन्य सामग्री को बांस के सूप और दउरा में सजाया जाता है।
- शाम के समय व्रती और परिवार के सदस्य इन पूजा सामग्रियों को लेकर नदी या तालाब के घाट पर जाते हैं।
- व्रती कमर तक जल में खड़े होकर, सूर्य की ओर मुख करके, तांबे के लोटे में दूध और जल भरकर डूबते हुए सूर्य को पहला अर्घ्य देते हैं।
- इस समय घाट पर छठी मैया के लोकगीत गाए जाते हैं।
- सूर्य भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और आरोग्य की कामना की जाती है।
- अर्घ्य के बाद रातभर जागरण और छठी मैया की कथा सुनी जाती है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण
यह पर्व का अंतिम दिन है, जिसे ‘पारण’ या ‘उदयगामी सूर्य को अर्घ्य’ देने के साथ समाप्त किया जाता है।
- व्रती और उनके परिवार अगली सुबह सूर्य उगने से पहले ही वापस घाट पर पहुंचते हैं।
- वे फिर से जल में खड़े होकर सूर्य के उगने की प्रतीक्षा करते हैं।
- जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखती है, व्रती उगते हुए सूर्य को दूसरा अर्घ्य देते हैं।
- अर्घ्य देने के बाद व्रती छठी मैया से प्रार्थना करते हैं और घाट पर ही प्रसाद का वितरण किया जाता है।
- इसके बाद व्रती घर आकर अदरक और जल लेकर अपना 36 घंटे का कठिन व्रत तोड़ते हैं।
- इसे ही पारण कहा जाता है, जिसके बाद ही परिवार के बाकी सदस्य भी प्रसाद ग्रहण करते हैं।
छठ पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह समाजिक एकता और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का भी एक माध्यम है। इस दौरान व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करते हैं, जो कि इस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण भावना है।
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