Protest: चीता आंदोलन का सातवां दिन, अनशन और सत्याग्रह अब भी जारी

Summary

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य विकास कार्यों की भेंट चढ़े विस्थापित परिवारों का संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। ‘चिता आंदोलन’ के नाम से चल रहा यह प्रदर्शन सातवें दिन भी पूरे उग्र रूप में जारी है। खराब मौसम और भारी बारिश के बावजूद सैकड़ों की संख्या…

पन्ना में विस्थापितों का ‘चिता आंदोलन’ सातवें दिन भी जारी, प्रशासन के साथ आर-पार की जंग

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य विकास कार्यों की भेंट चढ़े विस्थापित परिवारों का संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। ‘चिता आंदोलन’ के नाम से चल रहा यह प्रदर्शन सातवें दिन भी पूरे उग्र रूप में जारी है। खराब मौसम और भारी बारिश के बावजूद सैकड़ों की संख्या में आदिवासी महिलाएं, किसान और स्थानीय नागरिक अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। यह आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और हक की लड़ाई बन चुका है, जिसने पूरे क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है।

आंदोलन की मुख्य धुरी बने सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का आमरण अनशन चौथे दिन में प्रवेश कर गया है। इसके साथ ही, मिट्टी सत्याग्रह का तीसरा दिन और जल सत्याग्रह का दूसरा दिन भी जारी है। प्रदर्शनकारियों का जज्बा इतना बुलंद है कि वे बारिश की परवाह किए बिना खुले आसमान के नीचे अपनी मांगों को लेकर अड़े हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल कर दिया गया, लेकिन बदले में उन्हें जो मुआवजा मिला, वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

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मुआवजे में वृद्धि: एक आंशिक जीत या छलावा?

लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने रूंझ और मझगांय क्षेत्र के विस्थापितों के लिए मुआवजा राशि 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 12.50 लाख रुपये करने का निर्णय लिया है। इसके अलावा, पन्ना जिले के लिए 39 करोड़ रुपये की विशेष राशि भी स्वीकृत की गई है। हालांकि, विस्थापित इसे अपनी जीत का एक छोटा हिस्सा मानते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि यह राशि उनकी खोई हुई जमीन और आजीविका की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है।

आंदोलनकारियों की मुख्य चिंताएं अब भी जस की तस बनी हुई हैं। उनका कहना है कि जब तक हर एक विस्थापित परिवार को सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिलता और भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह आंदोलन किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होगा। प्रदर्शनकारी सरकार से ठोस और लिखित आश्वासन की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में उनके साथ दोबारा अन्याय न हो।

आंदोलन की चार प्रमुख मांगें

विस्थापितों ने प्रशासन के समक्ष अपनी चार सूत्रीय मांगें रखी हैं, जिन्हें लेकर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं:

  • सम्मानजनक पुनर्वास: सभी विस्थापित परिवारों को भूमि के बदले भूमि और रहने के लिए पक्के आवास का हक मिलना चाहिए।
  • उच्च-स्तरीय जांच: केन-बेतवा लिंक परियोजना और संबंधित कार्यों में हुए कथित घोटालों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई: परियोजना के दौरान धांधली करने वाले और विस्थापितों का हक मारने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित कर जेल भेजा जाए।
  • दमनकारी नीतियों पर रोक: प्रशासन द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए की जा रही डराने-धमकाने की कार्रवाई तत्काल प्रभाव से बंद की जाए।

अमित भटनागर का संकल्प: सम्मान की लड़ाई जारी रहेगी

सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने आंदोलन स्थल से हुंकार भरते हुए कहा कि यह लड़ाई सिर्फ रुपयों या मुआवजे की नहीं है, बल्कि यह स्वाभिमान की लड़ाई है। उन्होंने कहा, “हम तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को उसका वाजिब हक नहीं मिल जाता।” उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो आंदोलन और अधिक व्यापक रूप लेगा।

फिलहाल, पन्ना की सड़कों पर पसरा यह सन्नाटा किसी बड़े बदलाव की आहट दे रहा है। जिला प्रशासन अब बैकफुट पर नजर आ रहा है और सरकार पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है। देखना यह होगा कि क्या सरकार विस्थापितों की इन जायज मांगों को मानकर इस आंदोलन को समाप्त करा पाती है या फिर यह संघर्ष और अधिक लंबा खिंचेगा। फिलहाल, पन्ना के विस्थापित अपनी जमीन और सम्मान के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार नजर आ रहे हैं।