Education: छत्तीसगढ़ में बदहाल शिक्षा, कचरा केंद्र और सामुदायिक भवनों में पढ़ने को मजबूर बच्चे

Summary

छत्तीसगढ़ का मोहला-मानपुर जिला इन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। आदिवासी बहुल इस जिले में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है, जिसका सीधा असर स्कूली बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। जिला प्रशासन की उदासीनता और शिक्षा विभाग की लचर कार्यप्रणाली के चलते यहाँ के कई स्कूलों…

मोहला-मानपुर में बदहाल शिक्षा व्यवस्था: कचरा संग्रहण केंद्रों और सामुदायिक भवनों में भविष्य तलाशते नौनिहाल

छत्तीसगढ़ का मोहला-मानपुर जिला इन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। आदिवासी बहुल इस जिले में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है, जिसका सीधा असर स्कूली बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। जिला प्रशासन की उदासीनता और शिक्षा विभाग की लचर कार्यप्रणाली के चलते यहाँ के कई स्कूलों के पास अपने स्वयं के भवन तक नहीं हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि मासूम बच्चे अपनी पढ़ाई किसी स्कूल की चारदीवारी में नहीं, बल्कि खुले मंचों, सामुदायिक भवनों और यहाँ तक कि कचरा संग्रहण केंद्रों में बैठकर करने को मजबूर हैं।

इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिले के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस बदहाली के मूकदर्शक बने हुए हैं। शिक्षा समिति के सभापति और सत्ताधारी दल के जिला पंचायत सदस्य का अपना गृह क्षेत्र ‘औंधी’ ही इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यह स्थिति न केवल प्रशासन की कार्यक्षमता पर सवाल उठाती है, बल्कि क्षेत्र के बच्चों के मौलिक अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन है।

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कचरा संग्रहण केंद्र बन गए हैं पाठशाला

शिक्षा के नाम पर चल रहे इस मजाक की बानगी मोहला-मानपुर के विभिन्न गांवों में देखी जा सकती है। आलकन्हार जैसे गांवों में पिछले पांच वर्षों से स्कूल एक खुले रंगमंच पर संचालित हो रहा है। वहीं, मार्चुल, घोडाझरी और हुरेली जैसे गांवों की स्थिति और भी दयनीय है, जहां बच्चे महज एक कमरे के छोटे से सामुदायिक भवन में सिमटने को मजबूर हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति ग्राम बालेर की है, जहां पिछले तीन वर्षों से स्कूली बच्चे टीन की शेड वाले एक कचरा संग्रहण केंद्र में बैठकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यह दृश्य उन तमाम सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है, जिनमें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बात कही जाती है।

क्या हैं जमीनी हकीकत के मुख्य बिंदु:

  • भवन का अभाव: कई स्कूलों के पास अपना भवन नहीं है, जिससे पढ़ाई बाधित हो रही है।
  • अधूरे निर्माण कार्य: जिन भवनों को स्वीकृति मिली, उनका निर्माण डेढ़ से दो साल बीतने के बाद भी पूरा नहीं हुआ है।
  • जोखिम भरा माहौल: कई बच्चे आज भी जर्जर भवनों में जान जोखिम में डालकर पढ़ने को मजबूर हैं।
  • प्रशासनिक शिथिलता: शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की फाइलों में ही भविष्य की योजनाएं दम तोड़ रही हैं।

डेढ़-दो साल बाद भी निर्माण कार्यों का अधूरा होना

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि जो भवन स्वीकृत किए गए, उनका निर्माण भी कछुआ चाल से चल रहा है। कई गांवों में शाला भवनों की स्वीकृति मिलने के बाद भी डेढ़ से दो साल का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन निर्माण कार्य अभी भी पूर्ण नहीं हो पाया है। निर्माण में हो रही यह देरी इस बात को दर्शाती है कि प्रशासन को बच्चों के भविष्य की उतनी चिंता नहीं है, जितनी कागजी खानापूर्ति की है। समय पर निर्माण न होने के कारण उन बच्चों का कीमती समय भी बर्बाद हो रहा है, जो एक बेहतर शैक्षणिक माहौल के हकदार हैं।

प्रशासनिक उदासीनता और गिरता हुआ शिक्षा का स्तर

शिक्षा के प्रति प्रशासन की यह लापरवाही केवल भवनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के सर्वांगीण विकास में एक बड़ी बाधा है। जब एक बच्चा कचरा संग्रहण केंद्र या खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ाई करेगा, तो उससे बेहतर परिणाम की उम्मीद करना बेईमानी होगी। जिले के जिम्मेदार अधिकारियों को यह समझना होगा कि शिक्षा का अधिकार केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सुरक्षित और अनुकूल शैक्षणिक माहौल प्रदान करना भी सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।

आदिवासी बाहुल्य होने के नाते मोहला-मानपुर जिले को विशेष प्राथमिकता की आवश्यकता है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखकर लगता है कि शिक्षा विभाग की प्राथमिकता सूची में इन नौनिहालों का भविष्य कहीं पीछे छूट गया है। यदि जल्द ही इन स्कूलों के लिए पक्के भवन और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, तो आने वाले समय में जिले की साक्षरता दर और शिक्षा के स्तर में और भी बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।

अब समय आ गया है कि राज्य शासन इस मामले में संज्ञान ले और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करे। केवल प्रस्ताव भेजने या आश्वासन देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर स्कूलों का निर्माण और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना ही एकमात्र समाधान है।