बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को मिली करार हार के बाद, अब इस गठबंधन के नेताओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। हाल ही में दिल्ली के इंदिरा भवन में कांग्रेस के प्रत्याशियों के साथ एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें कांग्रेस के नेताओं ने यह आरोप लगाया कि इस बार पार्टी की जो स्थिति हुई है, वह मुख्यतः राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ गठबंधन के कारण है। उनका मानना है कि यदि पार्टी अकेले चुनाव लड़ती, तो बेहतर नतीजे मिलते। वहीं, इस आरोप पर राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि कांग्रेस को जितनी सीटें मिली हैं, वे राजद की वजह से ही संभव हो पाईं। अगर राजद का साथ नहीं होता, तो कांग्रेस का खाता भी नहीं खुलता।
कांग्रेस आलाकमान की समीक्षा बैठक
बिहार चुनाव में 61 सीटों पर लड़कर महज 6 सीटें जीतने के बाद, कांग्रेस आलाकमान ने अपने सभी प्रत्याशियों को दिल्ली बुलाकर एक समीक्षा बैठक का आयोजन किया। इस बैठक में पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता राहुल गांधी ने 10-10 नेताओं के समूह से मुलाकात की और उनसे फीडबैक लिया। इस दौरान सभी नेताओं ने एक स्वर में कहा कि यदि पार्टी चुनाव में अकेले उतरती, तो परिणाम बेहतर होते। राजद के साथ गठबंधन होने के कारण कई मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट नहीं दिया। मतदाताओं को यह भय था कि यदि राजद सत्ता में वापस आती है, तो बिहार में एक बार फिर से जंगलराज की वापसी हो सकती है।
राजद की समीक्षा बैठक
दूसरी ओर, पटना में राजद कार्यालय में भी समीक्षा बैठकों का क्रम जारी है। राजद के कई सीनियर नेता प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल की उपस्थिती में पार्टी के प्रत्याशियों के साथ बैठकों का आयोजन कर रहे हैं। इन बैठकों में हार के कारणों की तलाश की जा रही है कि आखिर किस वजह से पार्टी को इतनी बुरी हार का सामना करना पड़ा है। राजद के नेताओं का मानना है कि चुनावी रणनीति में कुछ कमियां थीं, जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है।
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गठबंधन के टूटने की आशंका
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कांग्रेस और राजद दोनों ही अपनी हार के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार मान रहे हैं। राजद के एक हिस्से का मानना है कि कांग्रेस के अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने और उनके वोटरों के वोट शिफ्ट न होने के कारण उन्हें यह हार मिली है। दूसरी ओर, कांग्रेस का खेमा यह मानता है कि राजद के 1990 से 2005 तक के शासनकाल के दौरान बिहार में जिस तरह की अराजकता थी, उसके कारण मतदाता उनके गठबंधन को वोट नहीं दे रहे हैं। इस स्थिति में, दोनों पार्टियां अब एक नया विकल्प तलाशने की कोशिश कर रही हैं।
हालांकि, इस स्थिति में क्या बदलाव आएगा, यह देखना दिलचस्प होगा। चुनावी परिणामों ने न केवल कांग्रेस और राजद के बीच की साझेदारी को प्रभावित किया है, बल्कि इससे बिहार की राजनीति में भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। दोनों दलों को अब यह सोचने की आवश्यकता है कि वे अपने मतदाताओं के विश्वास को कैसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं और भविष्य में बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं।
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